हसरतें

रूह को रूह से जुदा कर दे हिज्र की इन्तेहाँ ही फ़ुर्क़त है हालतें देख कर मेरी उसको हो गयी मुझ से ही मुरव्वत है

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इश्क़

बड़ी बदनाम है लड़की शहर की मुहब्बत हो गयी उस ही से मुझको वो दिल की चारा-साज़ी और ही थी मिला था दर्द जब उस ही से मुझको

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माँ

धीरे धीरे दिन चढ़ता गया और जोश भी ठंडा होता गया।शायद 40 साल का lockdown था और थकान भी। पूरी ज़िंदगी रसोई और पूजा घर मे जो निकला था। कभी दुसरो की पेट पूजा तो कभी भगवान की पूजा , और आशीर्वाद में मिला तो क्या घुटनो में दर्द और कई ऐसे दर्द जो अंदर ही अंदर दब गए हैं रीति रिवाजों के तले।

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