बचपन और ए दोस्त

अब बड़े हो  गए ज़िम्मेदारियों से भर गए, बचपन में निश्चिन्त बड़ी ख़ुशी ख़ुशी रहा करते थे, ना कोई ज़िम्मेदारी का अहसास था ना किसी चीज़ की फ़िकर, बस ख़ुद की ही दुनिया में मश्रूफ रहा करते थे, कोई तो लौटा दे वो बचपन मुझे अब, जो ना जाने कही खो गया है।

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