Translate

उन्नति के सूत्रधार – लेखक- प्रसाद डांगे

9 minutes read

Writing Contest August 2021 “An incident that changed your life” | Theme – Motivational Writing

highwayउस दिन मैं और मेरी आई (मराठी में माँ को आई कहते हैं) गाड़ी में बैठ कर भोपाल से इंदौर के लिए घर से निकले ही थे की गाड़ी अपने आप हाइवे की जगह गाँव वाले रास्ते पर मुड़ चली। गाँव वाला रास्ता यूँ तो पतला था लेकिन भीड़-भाड़ नहीं रहती इस रास्ते पर और २४ रु. का टोल टैक्स भी नहीं लगता। और फिर जो खेत खलिहान अपने मध्यप्रदेश में देखने को मिलते हैं वैसे नागपुर में कहाँ। पहले के गाँव के रास्ते “हाइवे टच” हो चुके थे लेकिन खेत अभी भी वैसे ही थे। रास्ते में बहुत से प्रॉपर्टी एजेंट लोगों को फ़ार्महाउस की ज़मीनें दिखाते हुए दिखे। भोपाली लोग वैसे भी खुले में रहना पसंद करते हैं और बहुत से उच्चमध्यम वर्ग के लोग अपने लिए एक वीकेंड होम लेने की चाह रखते हैं। भोपाल के आस पास के इस तरह की “हाइवे टच” ज़मीनें फ़ार्महाउस के लिए बेहद अनुकूल हैं। कुछ ७-८ साल बाद इस रूट पर आया था सो इस क्षेत्र की नयी नवेली आधुनिकता और प्रगति देख कर हतप्रभ था। बस १५-१६ किलोमीटर ही दूर निकला था की सब कुछ एकदम बदल गया। वही जाने पहचाने से लगने वाले गाँव के मकान, वो खेत, वो रहट और खेत जोतते हुए बैलों को हाँकता हुआ किसान फिर से नज़र आने लगे। और कुछ २-३ किलोमीटर आगे निकल तो याद आया की जहां आज एक हार्डवेयर की दुकान है वहाँ कभी एक चाय की दुकान थी। रामकिशन नाम था उसका, या उनका, मुझसे तो उम्र में २० साल बड़े थे, अब मेरे जितने बड़े तो उनके बच्चे होंगे।

उनके मँझले बेटे की शादी के दिन मैं यूँ ही अनायास उनके घर पर या यूँ कहूँ कि गाँव के सरकारी स्कूल को देखने आ गया था। किसी ने पूछा कि किस काम से आए हैं तो मैंने बस ऐसे ही पूछ लिया “माट्साब को पहचानते हो क्या?”। बस फिर क्या था, पूरे गाँव में खबर फैल गयी कि “माट्साब (मास्टर साहब) को लड़को आयो है”। रामकिशन जी को पता चला तो मुझे घर ले जा कर बहुत आवभगत की। फिर कहने लगे “माट्साब (मेरे पिता) की आज बहुत याद आ रही थी सुबह से। जो कुछ भी आज है, सब उनकी वजह से है। बेटे की शादी है आज, माट्साब नहीं आए तो उन्होंने आपको को भेज दिया। हमारे लिए तो ये माट्साब का ही आशीर्वाद है।” उनकी आँखें भर आयीं थीं यह कहते हुए लेकिन शायद उनको इसका आभास नहीं था, नहीं तो आँसू पोंछने की कोशिश ज़रूर करते।

मेरे पिता यानी कि पूरे गाँव के “माट्साब”, को दिवंगत हुए २७ वर्ष हो चुके है लेकिन इस गाँव में उन्हें कोई नहीं भूला। मेरा गाँव, बड़झिरी, जहां मैंने अपने जीवन के शुरुआती कुछ वर्ष बिताये। मेरा गाँव, जहां मेरी बहनें धूल खा कर धरतीपकड़ बनीं। मेरा गाँव, जहां आज आई को देख कर एक बुज़ुर्ग ने आँखों में आँसू भर कर कहा कि आप तो मेरे सामने दुल्हन बन कर इस गाँव में आयी थीं। मेरा गाँव, जो मेरे पिता को इतना प्रिय था कि परिवार को भोपाल में स्थानांतरित करने के बावजूद स्वयं का तबादला नहीं करवाया और प्रतिदिन (जीवन के अंतिम दिन तक) भोपाल और गाँव के बीच अप डाउन करते रहे। मेरा गाँव, बड़झिरी, जो आज भी कृतज्ञ है उनके समर्पण और गाँव के प्रति निश्छल प्रेम के लिए। उनके पढ़ाये कितने ही छात्र आज शासकीय पदों पर पदस्थ हैं, कोई मिलिट्री में चला गया, तो कोई अध्यापक बन गया। जो पढ़ पाए वो पढ़ कर आगे निकल गए, लेकिन ना पढ़ पाए, उनको आजीविका चलाने का मार्ग भी माट्साब ने ही दिखाया। रामकिशन जी उनमें से ही एक थे।

आई ने बताया कि जब वो गाँव में नयी आयी थीं तो रामकिशन उनके घर में ३-४ किलोमीटर दूर से कुँए से पानी भर कर लाता था। आई ने तो शादी के पहले कभी गाँव देखा भी नहीं था तो वहाँ की संघर्षपूर्ण जीवनशैली में एकदम से कैसे अपने आप को ढालतीं। लेकिन गाँव के लोगों ने बहुत मदद की। कुछ बच्चे पानी भर लाते, कुछ घर का दूसरा काम कर देते। सहायक शिक्षिका की परीक्षा देने के बाद जब आई की पहली पोस्टिंग हुई, तो वह गाँव हमारे गाँव से १० किलोमीटर दूर था। सुबह हमारे गाँव के बच्चे आई को वहाँ साइकिल से छोड़ आते, और स्कूल ख़त्म होने पर वहाँ के बच्चे घर तक साइकिल से छोड़ देते। हालाँकि १ साल बाद मेरे पिता ने आई का ट्रान्सफ़र हमारे ही गाँव में करवा लिया था। आई बताती है की जब मेरी बड़ी बहन होने वाली थी उस समय आई घर पर ही क्लास लगाती थी। गाँव के लोगों ने भी बहुत सहयोग किया और इस तरह उन्होंने १० साल इस गाँव व्यतीत कर दिए।

हम बच्चे बड़े होने लगे तो हमें बेहतर शिक्षा और जीवनशैली देने के लिए पिताजी ने आई का ट्रांसफ़र भोपाल करवा दिया लेकिन स्वयं को हमेशा गाँव से जोड़े रखा। क्योंकि मैं सबसे छोटा था तो मैंने ज़िद पकड़ के उनके साथ १ साल तक अपडाउन भी किया। ४ साल के बच्चे को रोज़ अपने साथ गाँव ले जाते और दिन भर स्कूल में अपने साथ रखते। शायद उस एक साल के दौरान मेरा गाँव मेरे डीएनए में रच बस गया था। मुझे तो तब गाँव ही अपना घर लगता था।दिनभर आई की याद भी नहीं आती थी। मोबाइल फ़ोन भी कहाँ थे उस समय कि झट से वीडिओ कॉल लगा कर फ़ट से बात कर ली। सच कहूँ तो इस मोबाइल फ़ोन ने मनुष्य के बीच अधिक सम्पर्क तो स्थापित किया लेकिन दूरी बढ़ा दी। आज सोचता हूँ तो वाक़ई लगता है कि आज हम अपने बच्चों को लेकर अत्यधिक चिंता करते हैं। या शायद आजकल ज़माने को समझना बहुत कठिन हो गया है। पहले सबकुछ बहुत सरल था, किसी पर सहसा विश्वास करना भी।

१ साल यूँ ही निकल गया और फिर मुझे भोपाल के एक अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय में भर्ती करवा दिया गया। उसके बाद कभी अपने गाँव गया हूँ ऐसा याद नहीं पड़ता। लेकिन न तो कभी मैं गाँव को भूला था और न ही गाँव भूला था अपने माट्साब के लड़के को। और उस दिन जब आई के साथ गाँव पहुँचा तो इस बात का साक्षात्कार भी हो गया।

तो हुआ यूँ कि जैसे ही हम अपने गाँव के पास पहुँचे, आई की व्याकुल आँखें उनके उस पुराने विद्यालय को ढूँढने लगीं जिसको कभी उन्होंने और माट्साब ने अपनी मेहनत और ईमानदारी सींचा था। सच्चा शिक्षक क्या होता है, इसका अहसास आज भी गाँव वालों के ज़हन में होगा। यदि मेरे गाँव वाले कभी शिक्षक का मूर्त रूप बनाएँगे, तो बिना प्रयास किए, स्वाभाविक रूप से मेरे माता पिता की मूर्ति बन जाएगी। हाइवे से बहुत खोजा उस विद्यालय को, लेकिन नए ज़माने की ऊँची इमारतों के बीच वो कवेलू की छत वाला विद्यालय कहाँ दिखता। लेकिन उस विद्यालय का क़द सबसे ऊँचा था क्योंकि वहाँ छात्र आँख की शर्म रखते और शिक्षक उन्हें अपने बच्चों की ही तरह डाँटते लेकिन उतना ही ध्यान भी रखते। कभी किसी अभिभावक ने यह नहीं कहा कि हमारे बच्चे को डाँट कैसे दिया।

विद्यालय को ढूँढते हुए रामकिशन जी की दुकान दिख गयी। जहां कुछ वर्षों पहले एक चाय की दुकान होती थी, वहाँ पर आज एक ४०० स्क्वेयर फ़ीट की पूर्ण रूप से समान से सुसज्जित हार्डवेअर “शॉप” थी। हर तरह का सामान रखा था, छोटी सी कील से लेकर टुल्लु पम्प तक सब कुछ था वहाँ। गल्ले पर एक नौजवान कैल्क्युलेटर और रजिस्टर ले कर कुछ हिसाब कर रहा था। पास वाली कुर्सी पर एक बुज़ुर्ग बैठे थे। गाँव में ऐसे दृश्य आम होते हैं जहां गाँव के बुज़ुर्ग चहल पहल वाली जगहों पर घंटों बैठे रेहते हैं। गाँव के सामाजिक ताने बाने की रखवाली करने वाले ऐसे बुज़ुर्ग हर गाँव में होते थे, शायद आज भी होते होंगे। इनके रहते कभी किसी लड़के ने किसी लड़की के साथ बदतमीज़ी करने की हिम्मत नहीं की होगी। हर गाँव के सच्चे “चौकीदार”, “बा साब”। सारे गाँव वाले उनको इसी नाम से जानते हैं। नए जमाने में पैदा हुए बच्चे तो शायद उनका असली नाम भी नहीं जानते होंगे। तो गल्ले पर उस नौजवान को बैठा देख मैंने सकुचाते हुए पूछा “यहाँ रामकिशन जी की चाय की दुकान थी, वो……”। उस नौजवान ने अपने रजिस्टर से ध्यान हटा कर मुझे ग़ौर से देखा और कहा “आप माट्साब के लड़के हो ना?”। मैंने अपने जीवन में बहुत से अप्रत्याशित क्षण देखे हैं, लेकिन इस व्यक्ति ने मुझे एक बार में पहचान कर आश्चर्य वो झटका दिया की मैं जीवन भर याद रखूँगा। जैसे ही मैंने “हाँ” में गर्दन हिलाई, वो अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया। मैंने बस इतना और कहा कि मम्मी साथ आयी हैं, फिर तो बस पूरे गाँव में फैल गयी कि मैडम आयी हैं।

मम्मी ने पूरे अधिकार से पूछा “रामकिशन कहाँ है?” उस दिन, उस जगह पर खड़ी हुई मेरी आई, सच में स्कूल की टीचर की तरह पूछ रही थी। रामकिशन के बेटे ने कहा “पापा खेत पर गए हैं, मैं फ़ोन करता हूँ उनको। नहीं तो ५ मिनट रुकिए मैं उनको बाइक पर ले ही आता हूँ।” फिर शायद रहा ना गया उससे तो फ़ोन ही लगा दिया “पापा!!! मैडम आयी हैं, आपको बुला रही हैं, जल्दी दुकान पर आओ।” रामकिशन को एक क्षण को समझ ही ना आया की कौन बुला रहा है। उसने जब दोबारा पूछा तो उनके बेटे ने कहा “बाइक भेजी है खेत पर, जल्दी आओ दुकान पर।”

जल्दबाज़ी में रामकिशन ने दुकान पर आते ही जैसे ही आई को देखा, उनकी आँखों से अनायास हाई आँसू निकल पड़े। आई के पाँव छू कर खड़े हो गए। आई के सामने बैठते कैसे? आई भी समझ गयी और कहा “रामकिशन बैठो, ३-३ बड़े लड़के हो गए अब तुम्हारे, अब भी क्यूँ खड़े हो? इतनी बढ़िया दुकान बना ली। चाय की दुकान बंद कर क्या? तुम्हारी माँ अभी हैं की नहीं? सब लड़कों की शादी हो गयी क्या? स्कूल वैसा ही है क्या अभी भी?” आई ने इतने सारे सवाल एक साँस में पूछ डाले, जैसे कि रामकिशन से पिछले कई सालों का अपडेट ले रही हो। रामकिशन जी तो जैसे मंत्रमुग्ध से खड़े थे। मैडम क्या पूछ रही हैं उसका शायद कोई जवाब नहीं सूझ रहा होगा। या शायद दिमाग़ और ज़ुबान में सामंजस्य नहीं हो पा रहा होगा। अक्सर ऐसा होता है जब कोई सुखद घटना अनायास जी घट जाती है, दिमाग़ काम करना बंद कर देता है, फ़्रीज़ हो जाता है। यह भी शायद ऐसा ही एक क्षण था, और मैं इसका साक्षी था। रामकिशन जी को कोई जवाब देता ना देख उनके बेटे ने बताना शुरू किया। “सब लड़कों की शादी हो गयी है। खेत की ज़मीन ले ली है, पापा दिन में खेत पर ही रहते हैं। चाय की दुकान मेन रोड पर थी इसलिए यहाँ हार्डवेयर की दुकान डाल ली। आपके आशीर्वाद से सब ठीक चल रहा है। पापा की चाय की दुकान से ही सब कुछ चालू हुआ था इसलिए वो चूल्हा और ओटला हमने तोड़ा नहीं। रुकिए मैं चाय बनता हूँ आपके लिए।” इतना कह कर रामकिशन का बेटा चाय बनाने लग गया। रामकिशन जी अभी भी कुछ कहने की अवस्था में नहीं थे। सिर्फ़ इतना बोल पाया कि माट्साब ने कहा था “रामकिशन, बस रुकती है यहाँ। एक चाय की दुकान बना ले। ख़ूब चलेगी।” आज उस चाय की दुकान से इतना सब बन गया।

रामकिशन आगे ना बोल पाया। आँखों से अविरल आंसू बह रहे थे। कृतज्ञता के आँसू थे की माट्साब ने दुकान डालने को ना कहा होता तो आज यह सब ना होता। या दुःख के आँसू थे की माट्साब यह सब देखने के लिए जीवित नहीं हैं। या सुख के आँसू थे की मैडम और माट्साब का लड़का आज यहाँ उसकी आँखों के सामने खड़े हैं और यह शायद माट्साब का अदृश्य आशीर्वाद ही है। माट्साब स्वर्ग में बैठे आज रामकिशन की प्रगति देख बहुत ख़ुश हो रहे होंगे। रामकिशन का बेटा चाय ले आया। चाय का एक घूँट पी कर समझ आ गया की उसने बहुत लगन से बनायी थी ठीक वैसे ही जैसे ठाकुरजी को भोग लगाने के लिए भक्त पूरे मन से नैवेद्य बनाता है।

अद्भुत दृश्य था। कुछ समय तक किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा की क्या बात करें। फिर “बा साब” ने बोलना शुरू किया, “दुल्हन बन के आयी थी, माट्साब की। और जब उनको लड़को हुओ, तो ढोल बजायो थो।” इतना बोल के बा साब भी भाव विव्हल हो गए। आते जाते लोग इकट्ठा होने लगे। सब आग्रह करने लगे की हमारे घर चलो। खड़े खड़े बस घर ही देख लो। चाय पी के जाओ। खाना खा लो। सबका आग्रह स्वीकार करना सम्भव नहीं था। और किसी एक के घर जा कर बाक़ियों को नाराज़ करना भी ठीक नहीं था। सो आई ने सबसे कहा की “बस अब निकलेंगे, अगली बार आऊँगी।”

गाड़ी में बैठते हुए भी सब एक एक करके बताते चले जा रहे थे की उन्होंने कहाँ दुकान ख़रीदी, कहाँ घर ख़रीदा, कहाँ खेत बनाया। हर कोई आई को बताना चाह रहा था की गाँव अब प्रगति कर चुका था और शायद यह वैसी ही भावना थी जैसे की आइ.ए.एस. की परीक्षा पास करके जब कोई विद्यार्थी अपने शिक्षक के पास जा कर विनम्रता से अपनी उपलब्धि बताता है। यह अहंकार मिश्रित उपलब्धि का बखान नहीं था। यह एक संदेश था, कि आपकी दी हुई शिक्षा व्यर्थ नहीं गयी। और आज हमने जो कुछ उपलब्धि हासिल की, उसमें आपका बड़ा योगदान है। आई सबकी बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी। मन मार कर गाड़ी में बैठी और जब गाड़ी गाँव से आगे निकल गयी तो मेरी ओर मुड़ कर कहा “बेटा, पैसे नहीं कमा पाए हम, लेकिन इस सम्पत्ति का कोई मोल नहीं हैं। हम किसी का जीवन बदल सकें और हमारे जाने के बाद भी लोग हमें याद रखें, बस यही सम्पत्ति सभी को कमानी चाहिए।”

आगे बातचीत करते करते कब भोपाल से इंदौर पहुँच गए यह पता ही नहीं चला। लेकिन उस दिन का अनुभव अद्भुत था, अद्वितीय था। इस घटना ने मेरी विचारधारा को बदल डाला। मेरी आई और मेरे पिता ने जो सम्मान कमाया वो हर शिक्षक की अमूल्य सम्पत्ति है। और ऐसे शिक्षक ही राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति होते हैं। समर्पण का मूर्त रूप एवं देश की उन्नति के सच्चे सूत्रधार।

यूँ ही नहीं कहते: “गुरू: ब्रम्हा, गुरू: विष्णु, गुरू: देवो महेश्वर:। गुरू: साक्षात् पर: ब्रम्ह, तस्मै श्री गुरूवे नम:।।”

Share on facebook
Facebook 0
Share on google
Google+ 0
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn 0
Share on whatsapp
WhatsApp

Leave a Reply

This Post Has 16 Comments

  1. Bahut hi sundar aur sajeev vivaran kiya kahani ka… Esa laga sub picture jaise ankho ke samne chal raha ho…

  2. Very nice prasad, kahi hui hat baat akhand satya he. Aaj bhi meri mummy ya didi ke koi bhi students milte he to un logo ke aankho me aansoo aur samman saaf jhalakta he.

    Aunty ko meri taraf se charan sparsh. Take care Bhai

  3. Beautifully scripted Prasad! Every scene u described is so relatable to many of us! Our parents deeds and memories alws leave an indelible mark on our overall life perspective and which was the distinct message elegantly spoken by you in this write up! You alws have had the flair for writing so……Keep writing and keep engrossing your readers!! Best Wishes!!

  4. Bahot hi umda lekh Prasad👌👌👌
    Maatr bhasa aur usme lekh likhne ki ek adbhud khoobi hai bhai tum mein. Tum bahot dilse likhte ho aur logo ke dil ko chu lete ho. Tumhe is likhne ki kala ke zohar ko aur aage le jana chahiye. Hum sub ki shubhkamnayen tumhare saath hai.👍

प्रातिक्रिया दे

Close Menu