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वृक्ष 

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                                    वृक्ष 

 (Hindi poem on nature)Poem On Nature

यह हरीतिमा वृक्ष खड़े

बन सच्चे सेवक उपकारी

मानव जीवन आधारित इन पर

पर देखो इनकी लाचारी

 

मानव ने स्वार्थ परक बनकर

सारे जंगल की काट लिए

यह निरीह से खड़े आज भी

मानवता की आस लिए

 

यह देता जीवन मानव को

पर मानव कर्तव्य जारी

यह प्राण दान वायु से देते

पर मानव दिखलाता है आरी

 

सदा सदा से पुष्पित होकर

पुष्प  हमें देते हैं वृक्ष 

पर मानव अपकारी बनकर

इन्हें नष्ट करने में दक्ष

 

फल देता है वृक्ष सदा से

 मानव करता है उपभोग

नव पल्लव ऋज नित कर हमको

करने देता है उपयोग

 

शाखा वनत बने जब जब यह

मानव इन्हें काट देता

फिर भी देखो दया वृक्ष की

हमको नवजीवन देता

 

खुद जल कर देता आग

कभी चिखता है

तब भी देखो यह ढीठ  मनुष्य

कुछ इनसे नहीं सीखता है

 

खुद सहते बाढ़ों की थपेड़ 

पानी की मार सदा सहते

खुद मिट कर भी मानव तुमको

माटी को ना बहने देते

 

 शीतल मंद पवन देते हैं

मानव को सुख पहुंचाने

 पर मानव इन को क्या देता

 यह तो मानव ही जाने

 

वृक्षों से मानव सीख लो

 संसार सुखद हो जाएगा

झगड़े झंझावात लूटमार का

 अंत सदा हो जाएगा

 

सेवा ,संयम, सत्कार, मिलन

मानवता इनसे सीखो

परोपकार, भलमनसाहत

सदा-सयता इनसे सीखो

………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………….

Dr. Ashok (Aaditya) Upadhyay

Veterinary Doctor

From Sagar MP | Poet |Poetries has been airrd on Akkashvaani.

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This Post Has 3 Comments

  1. बहुत सुंदर और दिल को झकझोर देने वाली कविता ।

  2. बहुत ही शानदार कविता ।दिल को झकझोर देने वाली कविता ।

  3. VERY TRUE and inspiration pome .
    AWESOME

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