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हसरतें

Urdu Shayari-  मुनफरीद की कलम से

1. हसरतें

हसरतों को अपनी परवाना बना लूँ क्या

उन्ही को मैं अपना दीवाना बना लूँ क्या

मेरी किताब का एक पन्ना कोरा पड़ा है

गर इजाज़त हो अफसाना बना लूँ क्या

बहुत हो चुका है अब जुनून-ए-मुहब्बत

दिल से अब उसको बेगाना बना लूँ क्या

अक्ल-ओ-होश अब बाक़ी कहाँ है मुझमें

दिल ही को अब फ़रज़ाना बना लूँ क्या

साक़ी के प्याले में अब वो बात नहीं

उसकी आँखों को मय-खाना बना लूँ क्या

क़रीब-ए-मर्ग हूँ नहीं है कोई नज़दीक

इन कौल-कलामों को शाना बना लूँ क्या

उसकी मुहब्बत पूछती है बारहाँ मुझसे

दिल-शहर का उसे शाहाना बना लूँ क्या

फ़रज़ाना: Wise/Intelligent

शाना: कंधा

शाहाना: Royal


2.

राह बाक़ी है अब भी अंजुमन बाक़ी है

उसके माथे पर अब भी शिकन बाक़ी है

अदब से कहिये चंद अश’आर निकाले

बज़्म हो चुकी है अब भी सुखन बाक़ी है

इंतेज़ार-ए-विसाल अब हो चुका पूरा

मेरी आँखों में अब भी थकन बाक़ी है

कर चुकी है वो अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़

मुझ में अब भी दीवाना-पन बाक़ी है

हिज्र में मता-ए-जाँ हालात ये हैं के

रूह मर चुकी है और बदन बाक़ी है

एक वो है पत्थर-दिल के मानता नहीं

एक हम में अब भी कोहकन बाक़ी है

निकलें हैं कूचा-ए-यार से गनीमत

गरेबाँ चाक है मगर पैरहन बाक़ी है

मुल्फलिसी है अपने चार-सू लेकिन

करिश्मा-ए-अक्स-ए-बदन बाक़ी है


3.

ज़िन्दगी अपनी खूबसूरत है

इसे किसकी अब ज़रूरत है

वफ़ा इख़्लास हिज्र क़ुर्बानी

यही एहसास तो मुहब्बत है

रूह को रूह से जुदा कर दे

हिज्र की इन्तेहाँ ही फ़ुर्क़त है

हालतें देख कर मेरी उसको

हो गयी मुझ से ही मुरव्वत है

वो मुझसे सब बता नहीं पाती

मेरी उस से यही शिकायत है

देखना उस ही को चार-सू मेरे

बन गयी अब तो मेरी आदत है

अब मैं ढूंढूँ कहाँ मुहब्बत को

हो गयी वो जहाँ से रुख़्सत है


Sujay Phatak

 

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